This year I had a wish to go for kanwar, but as it has been happening with all my wishes, I could not fulfill this wish also. However, I kept a watch on the newspapers and the chnnels on TV for the news relating to Kanwariyas..... .
The feeling that emerged incessantly are as follow:
शिव तुम क्या अब भी सावन में धरती पर आते हो?
सुना था बचपन में कि तुम भोले शंकर कहलाते हो,हर साल सावन में हिमालय से उतर कर आते हो,
भक्तों संग मिल अलख जगाते हो,
जेठ की सूखी, आषाढ़ की तरसी,
बिरहन घरती को पिया मिलन की आस दिलाते हो।
सुना था औघड हो, धूनी रमाते हो,
बसहा की सवारी है, माथे भभूत लगाते हो,
गौरी की अवमानना पर तांडव मचाते हो।
कल शिवरात्रि के मेले में लड़कियाँ छेडी गईं,
मन पूछ उठा कि,
शिव तुम क्या अब भी सावन में धरती पर आते हो?
जटा जूट पर चाँद है, गंगाधर कहलाते हो,
महादेव हो, रूद्र हो, डमरू बजाते हो,
स्रिष्टि का जहर पीकर नीलकंठ बन जाते हो,
कल कांवरियों में हुए दंगों की खबर देखकर
मुझे शक हुआ कि,
शिव तुम क्या अब भी सावन में धरती पर आते हो?
शंभू हो, शंकर हो, नटराज -जटाधारी हो,
त्रयंबक हो , त्रिपुरारि हो , त्रिशूलधारी हो ,
हिमालय निवासी हो , पशुपति कहलाते हो,
पर कहीं सूखा तो कहीं बाढ़ से त्राहि-त्राहि करती
दुखियारी धरती को देखने -
शिव तुम क्या अब भी सावन में धरती पर आते हो?
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