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Tuesday, 16 May 2017

--- यमुना किनारे की एक शाम-----
बैठ किनारे कालिन्दी के,
देख रहा हूँ ठहरा पानी।
सोच रहा हूँ मन ही मन में,
आखिर होगा कितना गहरा पानी।
चौड़ा पाट पर क्षीण धारा में,
कितना दर्द छिपाए है जो -
टेर द्रौपदी की, निर्भया की चीख,
सुनी पर हुई नहीं ये पानी-पानी।
बैठ किनारे कालिन्दी के,
देख रहा हूँ ठहरा पानी।
गजनी के कत्लेआम का खून,
या शीशगंज के वीरों की जवानी;
कालिय - विष या कृष्ण की माया,
कलुषित कैसे कृष्णा का पानी?
या फिर युगों-युगों के विध्वंस, कपट-छल,
षड्यंत्र और निर्लज्ज राजनीति से धूमिल,
है यह उतरा हुआ आँखों का पानी।
बैठ किनारे कालिन्दी के,
देख रहा हूँ ठहरा पानी।
किलों- मकबरों के टूटे कंगूरों से सुन लो,
या सुन लो फिर ज़फर की जुबानी;
यम की बहना की गोद में पलते,
बसते-उजड़ते इक शहर की कहानी;
विजय-तृष्णा के कोलाहल में प्रतिपल,
सुनकर 'हे राम' की खामोशी,
अब भी भर आता है आँखों में पानी।
बैठ किनारे कालिन्दी के,
देख रहा हूँ ठहरा पानी।
याद आती है वो बूढ़ी गंडक,
और बहकती कोशी की रवानी;
जीवन सरिता की दो बूंदों खातिर,
बस यूँ ही काट रहा हूँ कालापानी;
विवशताओं के बंजर वन में-
काश एक धारा मिल जाती तो,
तत्क्षण बन जाता मैं बहता पानी।
बैठ किनारे कालिन्दी के,
देख रहा हूँ ठहरा पानी।
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Prasad RK........ 16/5/2017 at IGI Airport

Thursday, 11 May 2017

Bhookh ki Talaash

How long does it take to revert back to your passions taking time off from the rigmarole of making the proverbial two ends meet ....and certainly trying to fulfill wishes of everybody around...!
So after a long break I am here again with a Hindi poem.... just edited today for posting !!

--भूख की तलाश --
किताबों में लिखा था,
गुरूजी ने भी कहा था;
ज़िन्दगी के सफर में अपना रास्ता चुनो,
सारी बातों के ऊपर अपने मन की सुनो.

बचपन से हर सुबह सूरज को ढूँढा,
रातों में चाँद और तारों से पूछा;
दौड़ में औरों को पीछे कर के देखा,
कारवां के पीछे चल कर के भी देखा.

हर राह पर खुद को बिन हमसफ़र पाया,
खुद को दो गज जमीं खोजता ज़फर पाया;
सुबह से निकलता था मंज़िलों की ओर,
घर के सुकून,गीतों,ग़ज़लों को छोड़.
 
लेकिन हर बार शाम को वही दर था,
अँधेरे में छिपा हुआ कोई डर था;
किताबों की इबारतें दिखती नहीं थीं,
गुरूजी की बातें रुचती नहीं थीं.

करें क्या आज,जब यही अनजाना है,
क्या सोचें कि कल कहाँ जाना है;
इक भूख ऐसी है जो कभी बुझती नहीं है,
दूसरी है ऐसी जो जगती ही नहीं है.

बुझनेवाली भूख तो सबको मिली है,
मगर दूसरी सकुचाई सी बंद कली है;
जीने की खातिर पहली भूख बुझानी ही होगी,
जीतने की खातिर खुद ही दूसरी जगानी होगी.