After a long time, I could pen down a few lines and now they bare there for you to savour .....!
............हमने शहर में क्या देखा.................
सरेशाम से रातभर शमा तो जलती दिखी,
पर हमने शहर में सहर होते नहीं देखा।
नींद से बोझिल हर आँख दिखती है,
किसी शख्स को बेखौफ सोते नहीं देखा।
मैयतों के जनाजों की रौनक के क्या कहने,
मरहूम की कब्र पर किसी को रोते नहीं देखा।
गलबहियों की नुमाइश सरेआम होती है,
किसी की आँखों में किसी को खोते नहीं देखा।
सावन भर कांवरियों के हुजूम लगते हैं,
किसी श्रवण कुमार को कांवर ढ़ोते नहीं देखा।
खबर छपती रही कि कत्ल हर गली में हुआ,
किसी दीवार से खून के छींटे धोते नहीं देखा।
ग्यान-ध्यान, मंत्र-अजान, बानी-कुर्बानी की रणभेरी देखी,
पर कभी दुआओं का असर होते नहीं देखा।
हमने इस शहर में सहर होते नहीं देखा।