It is the night before our National Festival, the Independence Day...... 15th August.
My salutations to the soldiers on the frontiers, to the workers on the shop-floor, to the mothers at homes, to the scientists in their labs, to the players on the playground, to the grandparents in their recluse, to the leaders in their teams, to the teachers in their schools and to the children in their dreams...........
I love dreaming and I am trying to weave through them..............
आओ कि कुछ सपने बुनें
समंदर का किनारा हो,
किनारे पर अठखेलियाँ करती लहरें हों,
लहरों के संग आयें सीपियाँ,
सीपियों को दौड़ दौड़ कर चुनें,
आओ कि कुछ सपने बुनें.
वादियों में एक शहर हो,
शहर में हो मुस्कुराती ज़िंदगी,
ज़िंदगी की भीड़ हो,
भीड़ में क्यूँ ना कोई अपना चुनें,
आओ कि कुछ सपने बुनें.
एक चाँद-तारों भरी रात हो,
रात की एक सुहानी भोर हो,
भोर की लाली में घुलता-
पँछियों का शोर हो,
उस शोर में हम एक लय अपना सुनें,
आओ कि कुछ सपने बुनें.
दोपहर की चिलचिलाती धूप हो,
धूप में खड़ा एक घना दरख़्त हो,
दरख़्त के सामने हो मंज़िल और
हाथ में कुछ वक़्त हो,
वक़्त इतना की लेटकर छाँव में,
सफर की ऊँच-नीच तो गिनें,
आओ कि कुछ सपने बुनें.
लम्बे दिन की ढलती हुई साँझ हो,
साँझ में भी हयात-ए-ज़ीस्त का साथ हो,
साथ जिसने निभाया हर झंझावात में,
इस आखरी झंझावात के सन्नाटे से
चलो क्यूं ना चुरायें कुछ धुनें,
आओ कि कुछ सपने बुनें.
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