Everyday the media is filled with news of horrendous & dastardly acts of the pervert pedophiles who pry upon the innocent kids in garb of a variety of socially acceptable roles to rob the kids of their childhood, their innocence, their serenity, their personality, their life, their...., their.... , their.........., ....................
An unanswered question looming large in the face of every parent today ................
माँ मुझे सब अकेले में क्यूँ बुलाते हैं?
शाम को जब हम
बच्चे खेलने जाते हैं,
एक अधेड़ से
अंकल को अक्सर वहाँ पाते हैं,
कभी गुड्डू, कभी मुन्नी, कभी मेरे पास आते हैं,
हमारे गाल, हमारी पीठ, हमारे बाल सहलाते हैं,
बड़ा अच्छा लगता
है जब हमें सीने से लगाते हैं,
पर माँ वो मुझे
अकेले में क्यूँ बुलाते हैं?
वो भइया जो पापा
के साथ ऑफिस जाते हैं,
वही जो कभी
आईसक्रीम, कभी चॉकलेट, कभी केक लाते हैं,
बड़ी प्यारी
कहानियाँ, चुटकुले और
पहेलिया बुझाते हैं,
कभी गुड़िया और
कभी बुढ़िया कह कर चिढाते हैं,
कंधे पर उठाते
हैं, कभी गोदी में
बिठाते हैं,
पर माँ वो मुझे अकेले में क्यूँ बुलाते
हैं?
स्कूल में जो
गुरूजी हमको पढाते हैं,
गणित, भूगोल, विज्ञान और इतिहास के अध्याय सिखाते हैं.
कभी व्याकरण के
भेद और कभी पहाड़ा रटाते हैं,
सद्गुण और
दुर्गुण का परस्पर भेद समझाते हैं,
ज़िंदगी की उचाइयों
को छूने का दिल में जोश जगाते हैं,
पर वो भी ना
जाने क्यूँ जवाब बताने अकेले में बुलाते हैं?
खेल के मैदान
में मेरे कोच हरदम मेरा हौसला बढ़ाते हैं,
होती हार को जीत
में बदलने का मुझमें जोश जगाते हैं,
मेरी दबी कुचली
प्रतिभा को नया उत्कर्ष दिलाते हैं,
थक जाती हूँ तो
अपने हाथ से ग्ल्यूकॉन का डब्बा थमाते हैं,
मेरी बहकती
ऊर्जा को एक नया आयाम दिलाते हैं,
पर ना जाने
क्यूँ वो भी अभ्यास को अकेले में बुलाते हैं?
दोस्त हैं वो जो
मेरे साथ स्कूल जाते हैं,
साथ जीने की और
साथ मरने की कसमें खाते हैं,
मेरे हमराज हैं
मेरे संग हर बात करते हैं,
धिंगा- मस्ती, नोक-झोंक और बिन बात शर्तें रखते हैं,
यूँ ही रूठते
हैं और फिर सब यूँ ही मनाते हैं,
पर ना जाने वो
दोस्त भी-
क्यूँ अब मुझे
अकेले में बुलाते हैं?
सलमा, मौलवी साहब की सुनायी आयतें दुहराती है,
क्रिश्टिना, पादरी के सिखाये कैरोल के धुन गुनगुनाती है,
गुरप्रीत, ग्रन्थी के बताये शबद सुर में गाती है,
मुझे भी
पण्डितजी के गीता-पाठ की याद आती है,
ये धर्म-कर्म, पाप-पुण्य के रास्ते बहुत लुभाते हैं,
पर ये तो बताये
कोई,
ये सिद्ध-ज्ञानी-ध्यानी
हमें अकेले में क्यूँ बुलाते
हैं?
माँ, अब तो डरने लगी हूँ,
जब सामने ट्रेन के खाली डब्बे आते हैं,
बस के कंडक्टर
और कैब के ड्राइवर चिल्लाते हैं,
ऑफिस में कभी जब
देर तक साहब बिठाते हैं,
साधना का नया
कोई आसन स्वामीजी सिखाते हैं,
कांधे पर बिठाकर
चाचा-मामा जब मेला दिखाते हैं,
यहाँ तक कि सपने
में जब मेरे भगवान आते हैं,
पता नहीं माँ -
ना जाने सब मुझे
अकेले में क्यूँ बुलाते हैं?
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