Every election brings new political parties to the fore and many of the actions of our leaders can be traced to our folklore. During the last election also, one could see some of previously very respected leaders towing the line of some quite unscrupulous bosses of their parties and speaking so high words, making untenable justifications for their high commands and turning blind eye to the most important of the national issues ....... my take on such erstwhile great leaders who fell from the pedestal ................
नये भारत की महाभारत
कहते हैं एक बार फिर गंगा स्वर्ग में गयी,
वहाँ उनकी
मुलाकात आठ वसुओं से भई,
अचानक हवा चली
और गंगा की चुनरी उड़ गयी,
दबाया तो बहुत
पर वसुओं की हँसी निकल गयी,
उनकी निर्लज्जता
देख गंगा बहुत नाराज हुई,
और वसुओं को
अपने गर्भ से पैदा करने का शाप दे गयी.
पर गंगा बेचारी
भूल गयी,
कि ये नया युग
है और है इसकी रीत नयी,
आठों वसुओं की इस युग में फिर पैदाइश हुई,
पर बेटों की
लालच में गंगा उन्हें डुबाना भूल गयी,
गर वे होती लड़कियाँ
तो पैदा ही ना करती,
या तो उनकी भ्रूण-हत्या
होती या अपनी मौत मरतीं.
आठों वसु
दिन-दिन बड़े हुये,
एक सरकारी
डॉक्टर और दूसरे ब्यूरोक्रैट भये,
तीसरे हुये इंजिनियर तो चौथे भये कॉंट्रॅक्टर,
पाँचवे हो गये पुलिस इनस्पेक्टर और छठे हुये प्रोफेसर,
सातवें वसु बने
वकील और आठवें हो गये नेता.
यही आठवें
नेता-वसु बने शपथ प्रथा के प्रणेता.
मत भूलो कि रीत
नयी है, ज़माना नया है
यह,
याद करो कि आठवें वसु थे भीष्म पितामह.
याद करो कि आठवें वसु थे भीष्म पितामह.
नेताजी ने ली है भीष्म प्रतिज्ञा,
अपनी कुर्सी के
आकाओं की मानेंगे हर आज्ञा.
अपने सपनों की
राह में आया हर कष्ट सहेंगे,
लेकिन हम कुर्सी
के साथ ही चिपके रहेंगे,
चाहे अंधा हो
राजा, लम्पट या हो
गूंगा,
मैं तो हर काम
में साथ उसका दूंगा.
द्रौपदी लुटे या
अभिमन्यु पिटे, मैं तो अपना
फ़र्ज़ निभाऊंगा,
कुर्सी की
ख़ातिर भला-बुरा कुछ भी कर जाऊँगा,
ब्रह्म्चर्य का
व्रत अगर लिया है तो निभाऊँगा,
पर अपने आका की
खुशी के लिये दूसरी माँ भी ले आऊंगा,
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