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Monday, 6 April 2020

कोरोना के "सन्नाटे से युद्ध"

"सन्नाटे से युद्ध"
बाहर जो पसरा है,
वो मौन नहीं, सन्नाटा है;
भय की परछाई है,
शत्रु के विरूद्ध आक्रोश है;
युद्ध सार्वभौमिक है.
दुश्मन अदृश्य निराकार है!

प्रकृति का ये रोष है,
या किसी प्रपंच का मायाजाल?
जाने-अनजाने हुई भूल है,
या विश्वविजय का कोई संघर्ष?
मानवता की परीक्षा है,
या विकास की विनाशलीला?

दुश्मन बड़ा ही मायावी है,
आ सकता है होकर दोस्त पर सवार;
यहाँ युद्ध नियम विपरीत हैं,
एकांत में है जीवन, समूह में मृत्यु;
यम-नियम-प्रतिहार जरूरी है,
आत्मानुशासन ही है इकलौता शस्त्र!

मत बढ़ने दो सन्नाटे को,
रखो इसे बाहर, अंदर मत आने दो;
मत हावी होने दो भय को,
प्रतिरोधक शक्तियों का आह्वान करो;
टाल दो संसर्ग-संपर्क को,
दूरियाँ बनाकर युद्ध का संधान करो!


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