Total Pageviews

Tuesday, 15 November 2016

माँ मैं तुमसे खफा हूँ ..

Life is a journey that we start without a choice. We are brought-up in a way that is not under our control, we are taught the language that we do not choose, we grow as a person that has been groomed not by us. Now I don't know who is responsible for our being what we are. Some say it is God, some say it is society, some others say it is providence........ I don't know any of them. I have not seen God, society is not visible to me, providence is so abstract to me....... I know the only reason for my existence - my mother !  Thus I can complain only to my mother...... !!!!

माँ मैं तुमसे खफा हूँ .. 

माँ मैं तुमसे खफा हूँ ! 

पूछोगी नहीं क्यूँ?

क्यों तूने मुझको इतना प्यार दिया ?
क्यों सत्यार्थ का दृढ विचार दिया ?
क्यों दया-दान का संस्कार दिया ?
क्यों दी मुझको ऐसी सीख,
जिसने मेरा जीना दुश्वार किया ?
इसीलिए माँ
मैं तुमसे खफा हूँ !



माँ मैं तुमसे खफा हूँ !

पूछो क्यूँ !
क्योंकि तूने मिट्टी के इस गुड़्डे को प्राण दिया,
क्योंकि बेढंगे से इक पुतले को गढ़ा और पहचान दिया,
क्योंकि इन आँखों को प्रथम ज्ञान का दृष्टिदान दिया,
बता  माँ -
क्यूँ ख़ुदा को उसकी रचना की खातिर,
मुझसे बिन पूछे अपनी कोख का दान दिया
इसीलिए माँ
मैं तुमसे खफा हूँ !



माँ मैं तुमसे खफा हूँ !

पूछोगी नहीं क्यूँ ?
मेरी बचकानी लालसाओं परअपने सुख का बलिदान दिया,
मुझमें मानवता की श्रेष्ठता का अभिमान दिया,
मेरे सपनों की उड़ान खातिर इक विशद आसमान दिया,
पर बोलो माँ
क्यूँ अपने आँचल से ढ़ककर तूने ,
मुझको दुनिया की दुश्वारियों से अनजान किया ?
इसीलिए माँ ,
मैं  तुमसे खफा हूँ !



माँ मैं तुमसे खफा हूँ !

पूछो  क्यूँ !
जब मैं सोता था, तू सारी रात पंखा डुलाती रही,
जब मैं रोता था,तू कभी खिलाती - कभी सुलाती रही,
जब मैं हँसता था,तू अपनी पीड़ा अपनी व्यथा छुपाती रही,
बोलो  माँ
मुझको जीवन-ऊष्मा देने खातिर
तुम क्यूँ अपना हाड-मांस यूं जलाती रही ?
इसीलिए माँ
मैं तुमसे खफा हूँ !



माँ मैं तुमसे खफा हूँ !

पूछो  क्यूँ !
क्यों मेरे दांत निकलते ही तूने अपना दूध छुड़ा दिया,
क्यों मेरे पंख निकलते ही तूने मुझे उड़ा दिया,
ना जाने मेरे किस बात पे कहती रही कि तेरा हियरा जुड़ा गया,
पर बता  माँ,
मुझ जैसी बेलगाम बछिया को बचाने खातिर
क्यों तूने अपना नाथ-पगहा तुड़ा दिया ?
इसीलिए माँ
मैं तुमसे खफा हूँ !



माँ मैं तुमसे खफा हूँ !

पूछो  क्यूँ !
क्योंकि तेरी बातों में अब तेरे दिल का मिलता नहीं हाल-चाल,
क्योंकि लगता है अब तेरे आंसुओं का कोई रखता नहीं ख्याल,
क्योंकि अब अक्सर बिन जवाब के ही रह जाते है तेरे सवाल,
और फिर भी तू -
अपने इन नाती-पोतों कि छोटी छोटी बातों पर,
क्यों जाती वारी-वारी,मुस्कुराती और होती रहती निहाल,
इसीलिए माँ
मैं तुमसे खफा हूँ !



माँ मैं तुमसे खफा हूँ !

पूछो  क्यूँ !
क्योंकि तू ज़िन्दगी कि दौड़ में मुझसे आगे निकल जाएगी,
क्योंकि अपना वादा भूलकर तू और बदल जाएगी,
क्योंकि तेरे हाथ से मेरी वो नन्ही सी ऊँगली फिसल जाएगी,
मुझे पता है माँ -
मुझको फिर अपने कोख में पाने खातिर,
तू मुझसे पहले अगले सफर पर इक दिन चल ही जाएगी !
इसीलिए माँ
मैं तुमसे खफा हूँ !

No comments:

Post a Comment