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Sunday, 17 February 2013

Zurm aur Saza (Hindi)

While going through the rigmarole of life one realises the importance of the people around and hopes to complement them for their contribution. But, the routine of living doesn't leave space for such exchange of feelings..... hence, this piece of my life-experience .......

ज़ुर्म और सज़ा 

मैं भी कैसा कैदी हूँ कि ,
अपने ही क़त्ल के जुर्म में सजायाफ्ता हूँ ;
हर दीवार पर तस्वीर खुदी है ,
पर अपनी ही गली में लापता हूँ।

वो मिले तो थे दोस्त बनकर,
ना जाने कब कातिल बन गए;
हमने उन्हें कमरा क्या दे दिया,
वो तो हमारे दिल में ही बस गए।

उनके साथ बिन जिधर से गुजरे हों कभी ,
ऐसा कोई रास्ता दिखता ही नहीं ;
उनके लबों पर सजने को जो बेताब न हों ,
जाने क्यूँ ये दिल ऐसे गीत लिखता ही नहीं।

दोस्ती के दर्द और दुश्मनी की खुशियाँ,
ज़िन्दगी की उलट्बांशियाँ बाँट  रहा हूँ,
जाने कैसी किस्मत है कि अपने,
कातिल के साथ ही जीने की सज़ा काट रहा हूँ।

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